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लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए लाए गए प्रस्ताव पर चर्चा के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में क्या कहा पढ़िए

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Last updated: March 12, 2026 1:03 pm
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Published: March 12, 2026
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माननीय सदस्यगण,

स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास में तीसरी बार लोक सभा के अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास के प्रस्ताव के संकल्प पर सदन में पिछले दो दिनों में माननीय सदस्यों ने 12 घंटे से अधिक चर्चा की। विभिन्न दलों के माननीय सदस्यों ने अपने-अपने विचार, अपने तर्क और अपनी चिंताएँ इस सदन के समक्ष रखीं। प्रतिपक्ष के माननीय सदस्यों ने विपक्ष की आवाज को दबाने और निष्पक्षता के अभाव की बात कही।

माननीय सदस्यों ने आसन की निष्पक्षता, सदन की कार्यकुशलता एवं भारत की संसद की वैश्विक उपलब्धियों की बात कही। वहीं माननीय सदस्यों ने हमारे संसदीय लोकतंत्र की व्याख्या की एवं सदन की गरिमापूर्ण परंपराओं, नियमों व प्रक्रियाओं पर अपना दृष्टिकोण भी रखा।

माननीय सदस्यगण,

यह सदन भारत के 140 करोड़ नागरिकों की संप्रभु इच्‍छा का प्रतिनिधित्‍व करता है। यहां उपस्थित प्रत्‍येक सदस्‍य लाखों नागरिकों के जनादेश को अपने साथ लेकर आता है – हर माननीय सदस्य, भारत के नागरिकों की समस्याओं – अभावों – कठिनाइयों को दूर करने और उनकी अपेक्षाओं – आकांक्षाओं – उम्मीदों को पूर्ण करने की आशा भी साथ लेकर आता है।

मैंने हमेशा यह प्रयास किया है कि सदन के अंदर प्रत्येक माननीय सदस्य नियमों और प्रक्रियाओं के तहत अपने विषय/ मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करें और सभी माननीय सदस्यों को इसके लिए पर्याप्त अवसर मिले। यह सदन समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े हर उस व्यक्ति की आवाज बने, जिसे आज हमारी सबसे अधिक आवश्यकता है।

मैंने यह भी निरन्तर प्रयास किया कि मैं उन माननीय सदस्यों को सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करूँ जो या तो नए हैं या बोलने में संकोच करते हैं। मैंने दोनों कार्यकाल में उन सभी माननीय सदस्यों से बोलने का आग्रह किया जिन्होंने सदन में एक बार भी नहीं बोला था, क्योंकि इस सदन में बोलने से लोकतंत्र का संकल्प और मजबूत होता है और सरकार की जवाबदेही भी तय होती है। यह सदन विचारों का, चर्चा का जीवंत मंच रहा है। हमारे संसदीय लोकतंत्र में सहमति – असहमति की महान परंपरा हमेशा से रही है।

माननीय सदस्यगण,

जब हमारे संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्र भारत के लिए संविधान का निर्माण किया, तब उन्होंने गहन विमर्श और अनुभव के आधार पर संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था को अपनाया। संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था आज निस्संदेह विश्व में शासन की सर्वश्रेष्ठ पद्धति है। इस व्यवस्था में संसद केवल कानून बनाने का मंच न होकर राष्ट्र की लोकतांत्रिक चेतना का केंद्र भी है।

भारतीय संविधान के आर्टिकल 93 में अध्यक्ष के निर्वाचन का प्रावधान है। मुझे इस पावन सदन ने दूसरी बार अध्यक्ष पद का दायित्व निभाने का अवसर दिया है। मैंने हमेशा यह प्रयास किया है कि सदन की कार्यवाही निष्पक्षता, अनुशासन, संतुलन और नियमों के साथ संचालित हो। सदन में सभी को साथ लेकर सामन्जस्य से व्‍यवस्‍था एवं कार्यकुशलता बनाये रखना अध्‍यक्ष का मुख्‍य कार्य है। मेरा हमेशा यह प्रयास रहता है कि सदन की गरिमा, मर्यादा और प्रतिष्ठा में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहे।

मंगलवार, दिनांक 10 फरवरी, 2026 को प्रतिपक्ष के कुछ माननीय सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया। हमारे महान संविधान द्वारा स्थापित संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था में मेरा अटूट विश्वास रहा है। मैंने अपने नैतिक कर्त्तव्य का निर्वहन करते हुए अविश्वास के प्रस्ताव के प्रस्तुतीकरण के साथ ही सदन की कार्यवाही से अपने आपको अलग कर लिया।

पिछले दो दिनों में इस सदन ने लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण संसदीय प्रक्रिया को पूरा किया है। इस चर्चा के दौरान अनेक विचार, अनेक दृष्टिकोण और अनेक भावनाएँ इस सदन के सामने रखी गईं। मैंने सदन के प्रत्येक माननीय सदस्य की बात को गंभीरता और ध्यान के साथ सुना है।

मैं इस सदन के सभी माननीय सदस्यों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ – चाहे उन्होंने समर्थन में अपने विचार रखे हों या आलोचना के रूप में अपने सुझाव दिए हों। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि यहाँ हर आवाज़ सुनी जाती है और हर दृष्टिकोण को महत्व दिया जाता है।

माननीय सदस्यगण,

यह आसन किसी व्यक्ति का नहीं है। यह भारत की लोकतांत्रिक परंपरा, संविधान की भावना और इस महान संस्था की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। मेरे पूर्ववर्ती अध्यक्षों ने इस सदन की मर्यादा और परम्परा को मजबूत किया है और हमेशा इस सदन की प्रतिष्ठा बढ़ाई है। संस्थाएँ, मर्यादा और परंपराएँ स्थायी रहती हैं। सदन द्वारा मुझ पर व्यक्त किए गए विश्वास का मैं हृदय से सम्मान करता हूँ। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इस विश्वास को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए, पूरी निष्ठा, निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा के साथ आगे निभाने का प्रयास करूँगा। चर्चा के दौरान कुछ माननीय सदस्‍यों ने कहा कि प्रतिपक्ष के नेता को बोलने से रोका जाता है व उन्‍हें बोलने का पर्याप्‍त अवसर नहीं दिया जाता है।

मैं इस पावन पीठ से यह स्‍पष्ट करना चाहता हूँ कि चाहे सदन के नेता हों, चाहे नेता प्रतिपक्ष हों, मंत्रिगण या अन्‍य कोई सदस्‍य हों – सभी माननीय सदस्‍यों को सदन के नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए ही बोलने का अधिकार मिलता है।

कुछ माननीय सदस्यों का यह मानना है कि प्रतिपक्ष के नेता सदन में कभी भी उठकर, किसी भी विषय पर, कुछ भी बोल सकते हैं। उन्हें लगता हैं कि यह उनका विशेषाधिकार है।

मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि सदन नियमों से चलता हैं – और सदन के कार्य-संचालन नियम सदन द्वारा ही बनाए गए हैं, ना सरकार द्वारा और ना ही प्रतिपक्ष द्वारा। ये नियम मुझे विरासत में मिले हैं। इस सदन में सभी सदस्यों पर नियम समान रूप से लागू है।

सदन में जब भी लोक महत्व के किसी विषय पर यदि माननीय प्रधानमंत्री जी या माननीय मंत्रीगण को वक्तव्य देना होता है, तो उन्हें नियम 372 के तहत अध्यक्ष से पूर्व सम्मति प्राप्त करनी होती है। उसके लिए भी नोटिस दिया जाता है। किसी भी माननीय सदस्‍य को नियमों से परे जाकर बोलने का विशेषाधिकार इस सदन में नहीं है। हमारे देश में लोकतांत्रिक संस्‍थाओं की गरिमा, मर्यादा और उनके नियमों के सम्‍मान की समृद्ध परंपरा रही है। मैं आपके समक्ष इसी सदन के माननीय पूर्व अध्यक्षों के निर्णयों का उल्लेख करना चाहता हूँ।

1957 में माननीय राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए जब श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने जम्मू और कश्मीर से संबंधित कुछ फोटोज को अपने द्वारा कही जा रही बात के प्रमाण के तौर पर सदन के सामने रखना चाहा, तो इसी चेयर से यह व्यवस्था दी गयी कि ऐसा करने से पहले वह उस document को पहले स्पीकर को दिखाएं। फिर वह निर्णय लेंगे कि ऐसा किया जा सकता है कि नहीं। अटल जी समेत सम्‍पूर्ण सदन ने अध्‍यक्ष द्वारा दी गई इस व्‍यवस्‍था को माना और ससम्‍मान पालना की।
1 मार्च 1958 को, जब माननीया सदस्य श्रीमती रेनु चक्रवर्ती जी ने किसी एक गैर-सरकारी दस्तावेज को सदन के पटल पर रखना चाहा, तो चेयर द्वारा यह कहकर नामंजूर कर दिया गया कि उसे बिना स्पीकर को दिखाए सभापटल पर नहीं रखा जा सकता।
26 मार्च 1958 को एक माननीय सदस्य एस. एम. बनर्जी ने अपनी बात के समर्थन में एक पत्र से quote करना चाहा, तो माननीय उपाध्यक्ष महोदय ने यह कहकर मना कर दिया कि आपको ऐसा करने से पहले चेयर को दिखाना जरूरी होता है, और वह आपने नहीं किया। इन दोनों प्रकरणों में भी सदन ने अध्‍यक्ष के निर्णय ससम्‍मान स्वीकार किये।
इसी प्रकार के लोक सभा में और संसद के दूसरे सदन, राज्य सभा में भी अनेक उदाहरण हैं, जब बिना चेयर की prior permission लिए हुए किसी दस्तावेज को सदन के पटल पर रखने या quote करने की अनुमति नहीं दी गई। इस परंपरा का सबने हमेशा सम्मान किया है।

अध्यक्षपीठ के निर्णय से कोई भी माननीय सदस्य व्यक्तिगत रूप से सहमत या असहमत हो सकता है, परंतु सदन के नियम प्रक्रिया व परंपराओं को लागू करना मेरा कर्तव्य है। जब भी कुछ माननीय सदस्य सदन की मर्यादाओं के विरूद्ध आचरण – व्यवहार करते हैं, तब सदन की मर्यादा को बनाए रखने के लिए मुझे कठोर निर्णय और व्यवस्था देनी पड़ती है।

चर्चा के दौरान एक माननीय विद्वान सदस्‍य ने संविधान के आर्टिकल 105 के तहत संसद के सदस्‍यों को संसद में बोलने की आजादी (Freedom of Speech) के अधिकार की बात कही।

मैं इस सदन के समक्ष हमारे संविधान के आर्टिकल 105 (1) को पढ़ कर इस संबंध में स्थिति स्‍पष्‍ट करना चाहूंगा –

‘’105 (1) – इस संविधान के उपबंधों और संसद की प्रक्रिया का विनियमन करने वाले नियमों और स्‍थायी आदेशों के अधीन रहते हुए, संसद में वाक्‍त – स्‍वातंत्रय (Freedom of Speech) होगा।‘’

अर्थात हमें संसद में बोलने की आजादी तो है परंतु सदन द्वारा स्वीकृत प्रक्रिया के नियमों एवं स्‍थायी आदेशों के अधीन।

नियम 352 के 11 उप-नियमों में माननीय सदस्यों के लिए विस्‍तृत निर्देश अंकित हैं कि सदन में बोलते समय किन बातों का ध्‍यान रखना चाहिए। किस प्रकार के तथ्‍य एवं किस प्रकार के वाक्‍यों को नहीं बोलना चाहिए।

चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि अध्‍यक्षपीठ के द्वारा प्रतिपक्ष के कुछ सदस्‍यों का माइक बन्‍द कर दिया जाता है।

इस बारे में मैं पहले भी यह स्‍पष्‍ट रूप से बता चुका हूँ कि आसन के पास माननीय सदस्‍यों के माइक ऑन या ऑफ करने का कोई बटन नहीं है। प्रतिपक्ष के कुछ माननीय सदस्‍य भी यहां पीठासीन अधिकारी के रूप में कार्य करते हैं – वे इस बात से भलीभांति अवगत हैं। सदन में यह व्‍यवस्‍था है कि जिस माननीय सदस्‍य को बोलने की अनुमति होती है, उस माननीय सदस्‍य का ही माइक ऑन रहता है।

चर्चा के दौरान माननीय महिला सदस्‍यों के सम्‍मान को लेकर भी विचार व्‍यक्‍त किए गए।

मेरे मन में हमेशा हमारी माननीय महिला सदस्‍यों के प्रति सर्वोच्‍च सम्‍मान का भाव रहा है। मेरा हमेशा से यह प्रयास रहा कि हर माननीय महिला सदस्‍य को सदन में बोलने का अवसर मिले। मुझे इस बात का गर्व है कि मेरे अध्‍यक्षीय कार्यकाल में प्रत्‍येक महिला सदस्‍य ने सदन में अपने बहुमूल्‍य विचार रखें हैं, चाहे वे प्रथम बार ही चुनकर आईं हो।

परंतु, जिस प्रकार से प्रतिपक्ष की कुछ माननीय सदस्‍य द्वारा वेल को क्रॉस कर ट्रेजरी बेंच की तरफ जाकर नारेबाजी कर रही थी और जिस प्रकार से बैनर दिखाया जा रहा था, उस समय कोई भी अप्रत्‍याशित स्थिति बन सकती थी। ऐसे किसी अप्रत्याशित स्थिति की संभावना को टालने एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए मुझे माननीय सदन के नेता से सदन में न आने का आग्रह करना पड़ा। ऐसी प्रतिकूल स्थिति में सदन की व्‍यवस्था और प्रतिष्‍ठा बनाये रखने के लिए जो उचित था, मैंने वही किया।

कुछ माननीय सदस्‍यों ने यह भी कहा कि अध्‍यक्ष – प्रतिपक्ष के माननीय सदस्‍यों को पर्याप्‍त अवसर नहीं देते हैं।

17वीं व 18वीं लोक सभा में संसदीय कार्यवाही के अधिकारिक आंकड़े सच्चाई उजागर करते हैं। यदि संख्या बल के आधार पर देखा जाए, तो प्रतिपक्ष के माननीय सदस्‍यों को राष्ट्रपति अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव, बजट, महत्वपूर्ण विधेयकों एवं अन्य विशेष चर्चाओं, प्रश्न काल एवं शून्य काल के दौरान आवंटित समय से अधिक समय बोलने का अवसर मिला है। ये तथ्य पिछले दो दिनों की चर्चा में यहां कई बार प्रस्तुत किये गये हैं।

मेरी हमेशा यह कोशिश रहती है कि समस्त सदस्यों को सदन में पर्याप्त अवसर मिले। मैंने यह प्रयास किया है कि कम संख्या वाले दलों के माननीय सदस्यों, केवल एक सदस्य वाले दलों एवं निर्दलीय सदस्यों को भी पर्याप्त मौका मिले। इसीलिए मैं अक्सर शून्य काल व डिबेट के निर्धारित आवंटित समय को बढ़ा देता हूँ।

कुछ माननीय सदस्यों के द्वारा निलंबन के विषय पर भी चर्चा की गई ।

मेरे आप सभी माननीय सदस्यों से दल से ऊपर उठकर गहरे व्यक्तिगत संबंध रहे हैं। मैं कभी भी नहीं चाहता कि किसी भी सदस्य के विरुद्ध कार्रवाई हो। लेकिन जब भी सदन की व्यवस्था बनाए रखने के लिए किसी भी माननीय सदस्य के विरुद्ध कार्रवाई की जाती है, तो मुझे गहरा दुख होता है।

परंतु, हमें यह विचार करना होगा कि ऐसी स्थिति ही क्‍यों उत्‍पन्‍न हुईं कि इस सदन को व्‍यवस्‍था बनाए रखने के लिए निलंबन जैसे कठोर निर्णय लेने पड़े। मेरा हमेशा यह आग्रह रहा है कि सदन में उच्च कोटि की परम्परा – मर्यादा बनी रहे। आज भी मैं, आग्रहपूर्वक आपसे कहना चाहता हूं कि नारेबाजी करना, नियोजित व्यवधान करना और शोर शराबा करना – ये हमारी संसदीय परम्परा का हिस्सा नहीं रहा है।

वर्ष 1997 में आजादी के पचास वर्ष की सालगिरह पर हुए सम्मेलन में और वर्ष 2001 में नई दिल्‍ली में हुए माननीय पीठासीन अधिकारियों, राज्‍यों के मुख्‍यमंत्रियों और चीफ व्हिप के सम्‍मेलन में सर्वसम्‍मति से यह संकल्‍प लिया गया था कि सदन में अनुचित आचरण जैसे कि नारेबाजी करना, इश्तिहार दिखाना, पत्रों को फाड़ना और फेंकना, अनुचित और अभद्र मुद्राओं का प्रदर्शन करना, अध्यक्ष के आसन के समीप जाना, प्रदर्शन करना, धरने पर बैठना, कार्यवाही में बाधा डालना और अन्य सदस्यों को न बोलने देना, व्यवस्था बनाए रखने के अध्यक्षपीठ के निर्देशों पर ध्यान न देना, पीठासीन अधिकारियों के विनिर्णयों पर प्रश्नचिन्ह लगाना, आदि से संसद और विधान मंडलों के समुचित कार्यकरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

वर्ष 2001 में हुए सम्‍मेलन में माननीय प्रतिपक्ष की नेता, जो कि कांग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेता हैं, ने कहा था कि व्यवधान को कम-से-कम करने के लिए सदन के बीचों-बीच (वेल ऑफ द हाऊस) आने पर पूर्णतया रोक लगनी चाहिए और इस मूल नियम के उल्लंघन पर स्वतः कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्‍होंने कहा था कि वे दृढ़ता से यह महसूस करती हैं कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के समय किसी भी प्रकार के व्यवधान की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

इस सम्मेलन में लगभग सभी मुख्‍य राजनीतिक दलों के नेताओं ने व्‍यापक राष्‍ट्रहित में सर्वसम्‍मति से ये संकल्‍प लिए थे। पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में भी हमेशा सदन की मर्यादा और गरिमा बनाने का संकल्प लिया गया है।

हमें हमेशा यह स्‍मरण रहना चाहिए कि सदन में चर्चा के दौरान मतभेद होंगे – विचारों के तीखे आदान-प्रदान भी होंगे।

लेकिन लोकतांत्रिक विमर्श और अव्यवस्था के बीच एक स्पष्ट रेखा होती है।

तख्तियाँ लहराना,

नारे लगाना,

कागज़ फाड़ना और फेंकना,

मेजों पर चढ़ना,

इस प्रकार के आचरण हमारी महान संसदीय परंपराओं के विरूद्ध हैं। यह केवल कार्यवाही को बाधित नहीं करते, बल्कि सदन की प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करते हैं।

माननीय सदस्यगण,

मेरे लिए आप सभी सदस्य माननीय है और मैं व्यक्तिश: आप सभी का सम्मान करता हूँ। मैं इस सदन में बैठने वाले प्रत्येक सदस्य में भारत के उन लाखों नागरिकों को देखता हूँ जिनका आप प्रतिनिधित्व करते हैं।

माननीय सदस्यगण,

पिछले दो दिनों की चर्चा में कई माननीय सदस्यों द्वारा संसद में 22 भाषाओं में अनुवाद, डिजीटल टेक्नोलोजी के उपयोग, रिसर्च सपोर्ट, कैपेसिटी बिल्डिंग, पी-20, CSPOC के सफल आयोजन, फ्रेंडशिप ग्रुप्स व अन्य विभिन्न उपलब्धियों की भी बात कही गई।

मुझे इस बात का भी गर्व है कि मेरे कार्यकाल के दौरान ही हमारी संसद ने अंग्रेजों द्वारा बनाए गए भवन से हमारे द्वारा बनाए गए इस नए भवन से कार्य करना आरम्भ किया। जब भी विदेशों से विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष और संसदीय शिष्टमंडल यहां आते हैं, वे हमारे इस नए संसद भवन की वास्तुकला से अभिभूत होकर प्रशंसा करते हैं। मुझे इस बारे में बस इतना कहना है कि ये समस्त उपलब्धियां व्यक्तिगत नहीं अपितु इस सदन की सामूहिक उपलब्धियां हैं।

विश्व भर में भारत के लोकतंत्र की बहुत बड़ी प्रतिष्ठा है। अन्य देशों के सांसद व अधिकारीगण हमारी संसद में प्रशिक्षण प्राप्त करने आते हैं। जब भी मैं अध्यक्ष के रूप में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेता हूँ, मुझे हमारे संविधान व हमारी संसद पर अत्यन्त गर्व की अनुभूति होती है।

माननीय सदस्यगण,

सदन के संचालन हेतु सदन द्वारा बनाए गए नियमों की पालना करना हम सभी सदस्यों की व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी है। परंतु यदि कोई माननीय सदस्य नियमों की अवहेलना करते हैं, और सदन के संचालन में व्यवधान उत्पन्न करते हैं, तो ऐसे सदस्यों का मार्गदर्शन करने, उन्हें चेतावनी देने और उनके विरुद्ध कार्यवाही करने का दायित्व इस पवित्र स्थान पर बैठने वाले अध्यक्ष यानि Speaker का है।

नियम 378 स्पष्ट कहता है कि “अध्यक्ष द्वारा व्यवस्था बनायी रखी जाएगी और अपने विनिश्चयों के प्रवर्तन के प्रयोजन के लिए अध्यक्ष को सब आवश्यक शक्तियां होंगी।“

माननीय सदस्यगण,

लोकतंत्र की संस्थाएँ स्थायी होती हैं। मजबूत संस्थाएं ही एक मजबूत लोकतंत्र का निर्माण करती है। यदि हम स्वयं ही इन संस्थाओं की प्रतिष्ठा को कम करेंगे, तो इससे किसी व्यक्ति अथवा दल को नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र को क्षति होगी। संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करना केवल औपचारिकता नहीं है। यह लोकतंत्र की स्थिरता का आधार है।

माननीय सदस्यगण,

जब-जब यहाँ सदन में शोर होता है, नियोजित व्यवधान होता है, तब-तब जनता के मन में निराशा पैदा होती है। मैं आपसे विनम्रतापूर्वक आग्रह करना चाहता हूँ कि भारत के जनमानस में सदन के प्रति विश्वास और भरोसा बनाए रखने में आप सभी सहयोग करें।

माननीय सदस्यगण,

हमारा महान संविधान, हमारे नियम व हमारी परंपरायें हमें विरासत में मिली हैं – जहां मुझे हमारी इस महान विरासत पर गर्व है – वहीं मेरा संकल्प है कि मैं इस महान विरासत को हमेशा आगे बढ़ाऊंगा और कभी भी इस सदन की मर्यादा में कमी नहीं होने दूंगा।

मैं सदन में पक्ष- प्रतिपक्ष सभी माननीय सदस्यों को संरक्षक के रूप में समान रूप से देखता हूं। चाहे कोई कितनी भी प्रतिकूल परिस्थिति पैदा करने की कोशिश करे, यह मेरा अटल संकल्प है कि मैं सदन की मर्यादा व प्रतिष्ठा बनाए रखूंगा। यह सदन हमेशा नियम प्रक्रिया से चला है और भविष्य में भी यह सदन नियम प्रक्रिया से ही चलेगा – चाहे कोई विशिष्ट सदस्य सहमत हों या नहीं।

माननीय सदस्यगण,

प्रशंसा हो या आलोचना —

इन सबके बीच मेरा एक ही संकल्प है:

सदन की मर्यादा और नियमों की रक्षा।

हम केवल संविधान के शब्दों का ही नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता यानि CONSTITUTIONAL MORALITY – (कंस्टिट्यूशनल मोरालिटी) का भी पालन करें।

आइए, हम सब मिलकर आज से एक नए, सकारात्मक और रचनात्मक अध्याय की शुरुआत करें। राष्ट्र सेवा और राष्ट्र निर्माण के मार्ग पर मिलकर आगे बढ़े।

आप सभी का धन्यवाद। जय हिन्द। जय भारत।

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