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HNLU के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश का संदेश: सहयोग और धैर्य से गढ़ें दीर्घ विधि करियर

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Last updated: February 22, 2026 2:20 pm
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Published: February 22, 2026
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हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय रायपुर के नवें दीक्षांत समारोह का आयोजन गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) न्यायमूर्ति सूर्यकांत मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अपने दीक्षांत भाषण में मुख्य न्यायाधीश ने विधि स्नातकों से धैर्य, निरंतर अध्ययन, निष्पक्षता और सहयोग की भावना को अपनाते हुए दीर्घ एवं सार्थक विधिक करियर के निर्माण का आह्वान किया।

“दीर्घ और फलदायी विधिक करियर का निर्वहन” विषय पर संबोधन देते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि दीक्षांत समारोह किसी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि जीवन के दो महत्वपूर्ण चरणों के बीच संक्रमण का बिंदु है। विश्वविद्यालय जीवन जहाँ पाठ्यक्रम और समय-सारिणी से संचालित होता है, वहीं पेशेवर जीवन में निर्णय स्वयं लेने होते हैं और मार्ग भी स्वयं प्रशस्त करना पड़ता है। उन्होंने विधि क्षेत्र को एक साधना बताते हुए कहा कि प्रतिष्ठा और अनुभव समय, समर्पण और निरंतरता से अर्जित होते हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने स्नातक विद्यार्थियों, उनके अभिभावकों और शिक्षकों को बधाई देते हुए इस उपलब्धि को संस्थान और परिवारों के लिए गौरव का क्षण बताया। विश्वविद्यालय परिसर के शैक्षणिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों से समृद्ध वातावरण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ अर्जित अनुभव और स्मृतियाँ विद्यार्थियों को जीवन भर मार्गदर्शन देंगी।

विधि पेशे में सहयोगात्मक दृष्टिकोण पर बल देते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि यद्यपि न्यायालयीन प्रक्रिया प्रतिद्वंद्वितापूर्ण प्रतीत होती है, किंतु इसकी मूल संरचना सहयोग पर आधारित है। न्यायालय में प्रस्तुत प्रत्येक तर्क के पीछे कनिष्ठ और वरिष्ठ अधिवक्ताओं, सहयोगियों तथा शोधकर्ताओं का सामूहिक प्रयास निहित होता है। उन्होंने एक महान नदी का उदाहरण देते हुए कहा कि अनेक धाराएँ मिलकर ही उसे सामर्थ्य प्रदान करती हैं; उसी प्रकार विधि समुदाय का प्रत्येक सदस्य न्याय की धारा को सशक्त बनाता है।

विद्यार्थियों से सहपाठियों और सहकर्मियों के प्रति सम्मान, सद्भाव और संवेदनशीलता बनाए रखने का आग्रह करते हुए उन्होंने कहा कि आज के सहपाठी ही भविष्य में सहयोगी, प्रतिपक्षी अधिवक्ता या न्यायाधीश बन सकते हैं। अपने प्रारंभिक वकालत काल का एक प्रसंग साझा करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि सहकर्मी को दिया गया मार्गदर्शन कैसे दीर्घकालिक पेशेवर विश्वास और सहयोग का आधार बना। उन्होंने कहा कि विधि पेशे में कोई भी सद्भावना व्यर्थ नहीं जाती।

प्रारंभिक वर्षों की धीमी प्रतीत होने वाली प्रगति पर टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि यही अवधि मजबूत पेशेवर आधार तैयार करती है। उन्होंने विद्यार्थियों को सलाह दी कि वे अपनी प्रगति का मूल्यांकन महीनों में नहीं, बल्कि वर्षों और दशकों में करें। निरंतरता, परिश्रम और निष्पक्षता ही स्थायी सम्मान का मार्ग प्रशस्त करती है।

समारोह में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Chhattisgarh High Court) के मुख्य न्यायाधीश एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने छह शोध उपाधि (डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी), अठासी विधि स्नातकोत्तर (मास्टर ऑफ लॉ) तथा एक सौ अड़तालीस कला एवं विधि स्नातक (ऑनर्स) की उपाधियाँ प्रदान कीं। कुल 242 विद्यार्थियों को डिग्रियाँ प्रदान की गईं। कार्यक्रम में विद्यार्थियों के अभिभावक, संकाय सदस्य और अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

समापन में मुख्य न्यायाधीश ने सभी स्नातकों को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ देते हुए अभिभावकों और प्राध्यापकों के योगदान की सराहना की। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि युवा विधि स्नातक सहयोग, धैर्य और नैतिक प्रतिबद्धता के साथ राष्ट्र की न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में सक्रिय भूमिका निभाएँगे।

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